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एक कुशल रणनीतिकार के तौर पर उभरे हैं आरपीएन सिंह




 









कांग्रेस के निराशा के दौर में रतनजीत प्रताप नारायण सिंह एक कुशल रणनीतिकार के तौर पर उभरे हैं, जिन्हें राजनीतिक हलकों में आरपीएन के नाम से जाना जाता है. कांग्रेस के झारखंड प्रभारी के रूप में उन्होंने विधानसभा चुनाव के पहले क्षेत्रीय दलों के साथ प्रभावी तालमेल बिठाने, क्षेत्रवार रणनीति बनाने पर जोर दिया और भारतीय जनता पार्टी के हाथ से सत्ता छीन ली. इतना ही नहीं, भाजपा का झारखंड में सबसे बड़ा दल होने का तमगा भी अलग राज्य बनने के बाद पहली बार छिन गया है.


बेहद सौम्य राजनेता माने जाने वाले आरपीएन का जन्म पड़रौना राजपरिवार में 25 अप्रैल 1964 में हुआ. पड़रौना उत्तर प्रदेश और बिहार राज्यों की सीमा पर स्थित एक कस्बा है, जिसे अब देवरिया जिले से अलग कर कुशीनगर नाम से अलग जिला बना दिया गया है. आरपीएन सिंह के पिता सीपीएन सिंह को इंदिरा गांधी राजनीति में लेकर आई थीं. पड़रौना और सीपीएन सिंह का महत्त्व इस तरह समझा जा सकता है कि इमरजेंसी में चुनाव में हार के बाद इंदिरा गांधी ने 1980 के लोकसभा चुनाव का प्रचार पड़रौना से शुरू किया. उस जनसभा का आयोजन आरपीएन के पिता ने कराया. सीपीएन सिंह इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में ताकतवर मंत्री माने जाते थे.


आरपीएन ने राजनीति विरासत में हासिल जरूर की है, लेकिन उन्हें अपनी जगह खुद बनानी पड़ी. उनका बचपन बोर्डिंग स्कूल में बीता. देश के जाने-माने दून स्कूल में रहकर उन्होंने शुरुआती शिक्षा ग्रहण की. 14 साल की उम्र में उन्होंने अपने पिता से संयुक्त राष्ट्र संघ और विश्व बैंक में नौकरी करने की इच्छा जताई. उनके पिता ने कभी उन्हें राजनीति में आने को प्रेरित नहीं किया और बेहतर पढ़ाई के लिए ही प्रेरित करते रहे, जिस दिशा में आरपीएन की रुचि थी.


 

आरपीएन बताते हैं कि वे औसत विद्यार्थी थे. बस इतना पढ़ लेते थे कि अच्छे कॉलेजों में उनका एडमिशन हो जाता था. दून स्कूल में पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने दिल्ली के जाने माने सेंट स्टीफेंस कॉलेज में एडमिशन लिया. 12 साल लगातार बोर्डिंग में रहने के बाद उन्हें सेंट स्टीफेंस में स्वतंत्रता मिली और वह खूब क्लास बंक करते थे. इसकी शिकायत उनके पिता तक पहुंच जाती थी. हालांकि, वह अपने सपने पर हमेशा लगे रहे और सेंट स्टीफेंस से इतिहास में ऑनर्स करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका चले गए।इसी समय उनके परिवार पर एक बड़ी मुसीबत आई. 52 साल की उम्र में सीपीएन सिंह की मौत हो गई. वह अमेरिका से पढ़ाई छोड़कर घर लौट आए. जमीन जायदाद के मुकदमे और राजनीति में शामिल होने के स्थानीय लोगों के दबाव ने उन्हें पड़रौना में उलझा दिया. आरपीएन पड़रौना के लोगों के कुंवर साहब और भैया जी बन गए, न चाहते हुए भी उन्होंने 1990 मे सक्रिय राजनीति में कदम रखा और कांग्रेस में शामिल हो गए. पहली बार 1993 में पड़रौना विधानसभा का चुनाव लड़े और हार गए. उसके बाद वह 1996, 2002, 2007 में विधानसभा चुनाव जीते. उस दौरान लोकसभा चुनाव में भी हाथ आजमाया, लेकिन सफलता नहीं मिली.आरपीएन उस दौर में कांग्रेस में शामिल हुए, जब न सिर्फ उनका परिवार, बल्कि पार्टी भी मुसीबत में थी. 1989 में वीपी सिंह की अगुआई में जनता दल सरकार बनने के बाद राज्य की राजनीति बदल चुकी थी. लोगों के बीच मंडल और कमंडल की ही चर्चा थी. पूर्वी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पर अलग से एक के बाद एक मुसीबतें आती रहीं. सबसे पहले गोरखपुर के कांग्रेस के लोकप्रिय नेता वीर बहादुर सिंह का कम उम्र में निधन हुआ. उसके कुछ साल बाद सीपीएन सिंह का निधन हो गया, जो पूर्वी यूपी के अलावा बिहार के कुछ इलाकों पर भी असर रखते थे. इसी दौरान पूर्वांचल और बिहार की राजनीति में अच्छी खासी दखल रखने वाले आजमगढ़-मऊ के कांग्रेस दिग्गज नेता कल्पनाथ राय का भी असामयिक निधन हो गया. वीर बहादुर सिंह और कल्पनाथ राय के परिवार के उत्तराधिकारियों ने भी कुछ कमाल नहीं दिखाया और अपनी राजनीति बचाने की कवायद में भाजपा सहित राज्य के क्षेत्रीय दलों का दामन थाम लिया. वहीं, आरपीएन लगातार कांग्रेस में बने रहे और विधानसभा व लोकसभा के माध्यम से संसदीय राजनीति में भी डटे रहे. कांग्रेस में सचिव, उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष सहित विभिन्न पदों पर जिम्मेदारियां निभाते रहे.


2009 के लोकसभा चुनाव में आरपीएन कुशीनगर लोकसभा से चुनाव जीतने में कामयाब रहे. उनका महत्त्व इस तरह से समझा जा सकता है कि मनमोहन सरकार के कार्यकाल में उन्हें सड़क परिवहन, पेट्रोलियम और संसदीय कार्य मंत्रालयों की जिम्मेदारी सौंपी गई. जब कानून व्यवस्था को लेकर कांग्रेस पर सवाल उठ रहे थे तो उन्हें गृह मंत्रालय में राज्यमंत्री के रूप में प्रभार सौंपा गया.


 

राजशाही विरासत पर उठे सवाल


कांग्रेस में राजा रजवाड़ों और खानदानी लोगों के दखल होने को लेकर आरपीएन कहते हैं कि लोकतंत्र में सबको जनता के बीच काम करने का मौका मिलता है. राजा हो, अमीर हो, गरीब हो, विद्यार्थी हो, सबके लिए समान अवसर है और जनता के बीच काम करके उसे जगह बनानी पड़ती है. लोकतंत्र में किसी को यह कहकर बाहर नहीं किया जा सकता है कि वह फलां खानदान से है. खुद के राजपरिवार से होने को लेकर भी उन्हें कोई परेशानी नहीं नजर आती और वह कहते हैं कि उनके परिवार ने इस इलाके के लिए बहुत काम किया है, जिसका राजनीतिक लाभ उन्हें मिलता है.


आरपीएन का मुख्य व्यवसाय अब खेती है. उनके लीची और आम के बगीचे हैं. साथ ही परंपरागत रूप से इलाके में गन्ने की खेती होती है और आरपीएन भी गन्ने की खेती करते हैं. पिछले 30 साल के दौरान पूर्वांचल में चीनी मिलों की दुर्दशा होने के कारण उन्होंने हाल में ही केले की खेती शुरू कर दी है. आरपीएन जब बोर्डिंग स्कूल में पढ़ते थे तो गर्मी की छुट्टियों में उनके पिता उन्हें पड़रौना लाते थे. वहां वह आस पड़ोस, परिवार और रिश्तेदारों के बीच रहते थे. पिता का इस बात पर जोर रहता कि अपनी माटी, अपनी बोली को भी सीखना समझना जरूरी है. अभी भी वह चुनाव के दौरान भोजपुरी में भाषण देते हैं. शानदार आवाज के धनी आरपीएन अंग्रेजी, हिंदी के साथ अपने गृह क्षेत्र की भोजपुरी भाषा में भी भाषण देते हुए बहुत सहज नजर आते हैं.


किसानों के सवालों को अहमियत


आरपीएन खुद किसान परिवार हैं और उन्हें सबसे ज्यादा चिंता किसानों की रहती है. 2005 में पड़रौना चीनी मिल चालू कराने के लिए उन्होंने आंदोलन किया और वह दो हफ्ते जेल में रहे. आरपीएन कहते हैं कि जब जब भाजपा सत्ता में आती है तो किसानों पर गोलियां चलती हैं और वह तबाह होते हैं. पड़रौना में चीनी मिल 2012 में उन्हीं के परिवार ने लगाई थी, जिसका बाद में राष्ट्रीयकरण कर दिया गया. उसके बाद वह मिल निजी हाथों में दे दी गई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर तमाम नेताओं ने चीनी मिल चालू कराने का वादा किया, लेकिन समस्या यथावत बनी हुई है.


झारखंड में गठबंधन की जीत का मंत्र वह बेरोजगारी, किसानों की मुसीबत, भुखमरी, गरीबों को परेशान करने वाले कानून और 10,000 आदिवासियों पर एकसाथ राजद्रोह के मुकदमे लगाए जाने को बताते हुए कहते हैं कि जनता ने असल मुद्दों व राजनीति पर मुहर लगाई है.






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