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हर चुनाव में मीडिया आता हमें हमारे हाल पर छोड़ कर चला जाता है

बोकारो: 'हर चुनाव में नेता व मीडिया आता है और फिर हमें अपने हाल पर छोड़ कर चला जाता है. इन चमचमाती गाड़ियों के पीछे दौड़ते हमारे अति उत्साही बच्चों को देखिए. हम भी यही सपना देखते थे कि प्लांट लगेगा तो गांव से चमचमाते शहर बनेंगे. लेकिन हम तो ना ही पंचायत रहे और ना ही शहर बने. अब हम हर वक्त स्टील प्लांट की चिमनियों से निकलते धुएं को फांकते हैं.' ये कहना है बोकारो जिला के बैधमारा गांव के 62 वर्षीय बुजुर्ग का. दिसंबर 9 तारीख को बोकारो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली थी. इस गांव के कुछ लोग भी देश के सबसे प्रभावशाली व्यक्ति की झलक पाने के लिए जैसे-तैसे गए. वापस लौटे तब तक शाम गहरा चुकी थी. यह अंधेरा ठीक वैसा ही था जैसा यहां पिछले पांच दशकों से फैला हुआ है.


ये गांव बोकारो के उन 19 विस्थापित गांवों में से एक है जो लोकसभा चुनाव में अपने प्रतिनिधि को सदन तक भेजते तो हैं, लेकिन इनकी कोई ग्रामसभा नहीं है.


बैधमारा के बुजुर्ग आगे जोड़ते हैं, 'कहने को तो देश में लोकतंत्र है लेकिन हम अपना ग्राम प्रधान नहीं चुन सकते. ग्राम प्रधान नहीं है तो हमें स्वच्छ भारत अभियान के तहत मिले शौचालय कौन दिलवाएगा. बोकारो को खुले में शौच मुक्त घोषित किया जा चुका है.'


 

कैसे आई इन 19 गांवों में ये बदनसीबी


1960 के दशक में भारत सरकार और सोवियत यूनियन की एक साझेदारी से बोकारी स्टील प्लांट स्थापित किया गया था. निर्माण शुरू होने से पहले सरकार ने 1956 में ही भूमि अधिग्रहण का नोटिस जारी कर दिया था. सरकारी कागजात बताते हैं कि बोकारो स्टील प्लांट के लिए 15,685 हेक्टेयर जमीन अधिकृत की गई थी जिसमें 1,772 हेक्टेयर जमीन राज्य सरकार ने दी थी और बाकी जमीन आस-पास के 80 गांवों से अधिग्रहण की गई थी. लेकिन इस जमीन का 7,765 हेक्टेयर हिस्सा ही प्लांट के लिए इस्तेमाल किया गया. बचे हिस्से में से 169 हेक्टेयर जमीन पट्टे पर दे दी गई और 3,818 हेक्टेयर जमीन अनुपयोगी हो गई।बोकारो स्टील प्लांट के एक तरफ बढ़िया सेक्टर बने हुए हैं और दूसरी तरफ धुएं के गुबार में लिपटे करीब 80,000 हजार लोग. 80 गांवों में से 19 को छोड़कर बाकियों को पुनर्वासित कर दिया गया था. भविष्य में प्लांट के विस्तार की संभावना की वजह से इन गांवों को छोड़ दिया गया. इन गांवों ने ना ही मुआवजा स्वीकार किया और ना ही जमीनें खाली की. 1969 में प्लांट ने घोषणा करके बताया भी था कि उसके पास 2,954 हेक्टेयर सरप्लस जमीन है जो वो राज्य सरकार को वापस करना चाहते हैं. लेकिन सरकार और प्लांट के बीच इस मामले को लेकर अभी तक कोई खास परिणाम नहीं निकले हैं. इसलिए इन 19 गांवों को ना तो ज़मीन वापस मिली और ना ही मुआवजा.


छह दशक बाद स्थिति ज्यों की त्यों


स्टील प्लांट के कारखानों से निकली राख (एश) के पहाड़ बन चुके हैं. इस पहाड़ की तलहटी में बसे गांव मोदीडीह के लोग विकास नाम की चिड़िया से महरूम हैं. तेज हवा का झोंका आता है तो पांच मीटर दूर खड़ा व्यक्ति भी दिखाई नहीं देता. कारखानों के फैलाए प्रदूषण ने यहां चर्म रोगों को न्यौता दिया हुआ है. इस गांव में अब तक कई अपंग बच्चे पैदा हो चुके हैं. 46 वर्षीय केदार मोदी दिप्रिंट को बताते हैं, 'पिछली बार बोकारो के भाजपा विधायक विरंची नारायण को वोट दिया था. उन्होंने सड़कें तो सारे इलाके में बनवाई हैं लेकिन हमारे गांव तक वो सड़क कभी आई ही नहीं.'


इन्हीं गांवों के 22 वर्षीय रॉकी कुमार पूछते हैं, 'अखबारों में छपता है कि लोकतंत्र का पर्व चल रहा है तो हम लोग कौन हैं? रोहिंग्या मुसलमान हैं? पाकिस्तान से आए हैं? कहां के हैं हम लोग. हम बस सांसद और विधायक बनाने के लिए यहां रखे हुए हैं.'


 

विस्थापित साझा मंच के एक मेंबर अरविंद कुमार को बताते हैं, 'हर साल विस्थापितों के लिए सीएसआर से फंड जारी होता है. पहले इसकी गाइडलाइन्स थीं कि 20 किलोमीटर की रेडियस में काम करवाने हैं.


तब प्लांट हैंडपंप लगवाकर इस फंड का इस्तेमाल लेकिन इन गांवों में इस फंड द्वारा किए गए कुछ काम दिखाई नहीं दिए. एक तरह से इन ग्रामीणों को न ही तो विस्थापितों वाली सुविधाएं मिल रही हैं और ना ही इन्हें सरकारी योजनाओं का ही लाभ मिला है, जैसे- वृद्धा पेंशन, शौचालय, आवास योजना और मनरेगा इत्यादि.


हजारों याचिकाएं, गिरफ्तारियां और धरने, सब फेल


2011 में झारखंड हाई कोर्ट ने 18 गांवों के 10,312 निवेदकों को करीब 300 करोड़ का मुआवजा देने का ऑर्डर दिया था. उस वक्त सात दिन की एक प्रक्रिया के तहत विस्थापित लोगों की पहचान होनी थी. 2015 में छपी down to earth की एक रिपोर्ट बताती है कि बिहार के पूर्व मंत्री अकलूराम महतो इन विस्थापितों को उचित मुआवजा दिलाने के लिए निदेशक, परियोजना और भूमि पुनर्वास (डीपीएलआर) में 42,000 याचिकाएं दायर कर चुके हैं लेकिन उनमें से सिर्फ 10,312 ही पेंडिंग हैं. बाकी सारी गुम हो चुकी हैं।इस साल संसद के मानसून सत्र में धनबाद के सांसद पशुपतिनाथ सिंह ने इन विस्थापित 19 गांवों का मुद्दा उठाते हुए कहा था कि प्लांट के लिए अधिग्रहण की गई कुछ खाली जमीन यूं ही पड़ी है. जब ये जमीन ना ही इस्तेमाल की जा रही है और निकट भविष्य में इसके इस्तेमाल की कोई संभावना नहीं है तो सरकार इस जमीन को प्लांट से मुक्त कराके इन गांवों की जनसुविधा के लिए इस्तेमाल करे. साथ ही इन गांवों को पंचायती सिस्टम में शामिल किए जाने की प्रक्रिया शुरू हो सके.


रॉकी आगे जोड़ते हैं, 'विस्थापितों के अधिकारों के लिए अब तक लगभग 50 संगठन बन चुके हैं. जैसे, विस्थापित बेरोजगार मुक्ति संगठन, मजदूर संगठन समिति आदि. समय-समय पर बड़े जनआंदोलन किए गए. संगठन के नेताओं की गिरफ्तारियां भी हुईं लेकिन ये हाल पिछले छह दशक से ज्यों का त्यों है. दशकों से चले आ रहे इन धरनों से हम लोग अब परेशान हो चुके हैं. पुलिस कार्रवाई से थक चुके हैं.'


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