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तरक्की पर ले जा रहा है इसरो







भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के लिए 2019 कामयाबी का सुनहरा साल साबित हुआ है। इस साल भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी ने छह प्रक्षेपण यानों का अभियान सफलतापूर्वक अंजाम देने के साथ सात उपग्रह अभियानों में भी परचम लहराया। हालांकि चंद्रमा की सतह पर भारतीय यान चंद्रयान-2 को सकुशल उतारने में मिली नाकामी ने इसरो के इस स्वर्णिम सफर को थोड़ा धूमिल जरूर कर दिया। 


 


अगर साल भर में सफल अभियानों को संख्या के हिसाब से देखें तो यह वर्ष 2018 में अंजाम दिए गए 16 अभियानों की तुलना में कम लग सकता है लेकिन इसरो ने वर्ष 2019 में कुछ बेहद अहम एवं जटिल अभियान पूरे किए हैं। चंद्रमा के अंधेरे हिस्से पर चंद्रयान-2 भेजने के बेहद जटिल अभियान के अलावा बेहद महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रमों गगनयान और आदित्य-1 की दिशा में भी वह आगे बढ़ा।


 




गगनयान के तहत भारत अंतरिक्ष में पहली बार अंतरिक्षयात्री भेजने के मिशन पर काम कर रहा है जबकि आदित्य-1 को सूर्य की तरफ भेजा जाएगा। वर्ष 2019 की शुरुआत में इसरो ने बताया था कि इस साल उसकी  32 अभियानों को अंजाम देने की योजना है। इनमें 14 यान प्रक्षेपण, 17 उपग्रह प्रक्षेपण और एक तकनीकी प्रदर्शन अभियानों की योजना थी। इस दौरान चंद्रयान-2 के जटिल अभियान के अलावा लघु उपग्रह प्रक्षेपण यान (एसएसएलवी) के विकास से जुड़े परीक्षण भी शामिल थे। एसएसएलवी को छोटे उपग्रहों के प्रक्षेपण यान के तौर पर विकसित किया जा रहा है।


 


पिछले साल 16 अभियान पूरे करने वाले इसरो ने 2019 की शुरुआत किसी प्रक्षेपण से नहीं बल्कि अपने भरोसेमंद ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी) के उत्पादन की आउटसोर्सिंग के लिए उद्योगों के साथ सहमति ज्ञापन पर दस्तखत से किया। इसे एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है क्योंकि इसके बाद इसरो रॉकेट तैयार करने के बजाय उपग्रहों के कामकाज पर अधिक ध्यान दे सकेगा। इसरो के चेयरमैन के शिवन का कहना है कि इससे समय एवं संसाधनों की बचत होगी।


 




यह भी ध्यान रखना होगा कि भारत सरकार ने कई उन्नत समयबद्ध परियोजनाओं को स्वीकृति दी है। इनमें जीएसएलवी मैक-3 के वाणिज्यिक इस्तेमाल, अद्र्ध-क्रायोजेनिक स्तर के डिजाइन एवं विकास और मानवयुक्त अंतरिक्ष अभियान गगनयान को मंजूरी जैसे प्रस्ताव शामिल हैं। शिवन कहते हैं, 'यह साफ है कि इन परियोजनाओं को समय पर पूरा करने के लिए इसरो के सीमित संसाधनों का इस्तेमाल किया जाएगा। इसमें अनुसंधान एवं विकास के काफी काम शामिल हैं। पीएसएलवी का नियमित उत्पादन एक उद्योग कंसोर्टियम करेगा और इसरो मिशन विश्लेषण एवं योजना और नियंत्रण के कामों से जुड़ा रहेगा।' 


 


इसरो ने एकेडेमिया के साथ अपनी भागीदारी को भी मजबूत करने की कोशिश की है। देश भर के छह अलग इलाकों में स्थित एकेडेमिया केंद्रों में इसरो अपनी छह शोध पीठ गठित करने वाला है। इन पीठों का इस्तेमाल उभरती तकनीकों के विकास की जरूरत पूरी करने और इन्क्यूबेशन सेंटर के तौर पर किया जाएगा। प्रक्षेपण की शुरुआत 24 जनवरी को पीएसएलवी-सी44 अभियान के साथ हुई। यह पीएसएलवी के नए संस्करण पीएसएलवी-डीएल का पहला मिशन था। यह रॉकेट अपने साथ इमेजिंग उपग्रह माइक्रोसैट-आर और छात्रों द्वारा बनाया गया कलामसैट लेकर अंतरिक्ष में गया। कलामसैट को सौर समकालिक धु्रवीय कक्षा में स्थापित किया गया।


 




इसके बाद इसरो ने अगले चार महीनों के दौरान तीन अभियानों को अंजाम दिया। इनमें से एक उपग्रह मई में फ्रेंच गुयाना से प्रक्षेपित किया गया। गगनयान परियोजना के लिए चालक दल के चयन और प्रशिक्षण में सहयोग के लिए इसरो ने वायु सेना के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। गगनयान देश का पहला मानवयुक्त अंतरिक्ष कार्यक्रम है जिसे 2022 में प्रक्षेपित करने की योजना है। 


 


इस बीच सरकार ने मार्च 2019 में न्यूस्पेस इंडिया के गठन की घोषणा की। इसकी कारोबारी योजना एंट्रिक्स कॉरपोरेशन की तरह होगी जो इसरो की पहली व्यावसायिक कंपनी है। यह पीएसएलवी के लिए नोडल एजेंसी होगी। जून से सितंबर तक इसरो का ज्यादा जोर चंद्रयान-2 पर रहा। इसे पहले दिन से ही कह रहा था कि यह अभियान तकनीकी रूप से ज्यादा चुनौतीपूर्ण है। इसरो ने इसके लैंडर को चंद्रमा के दक्षिणी धु्रव पर उतारने की कोशिश की जहां अभी तक कोई देश नहीं पहुंचा है। 15 जुलाई को अंतिम क्षणों में इस अभियान को तकनीकी गड़बड़ी के कारण टाल दिया गया। इस गड़बड़ी को दूर करने के बाद चंद्रयान-2 को 22 जुलाई को 48 दिन की यात्रा पर रवाना कर दिया गया। ऑर्बिटर को 2 जुलाई को सफलतापूर्वक चंद्रमा की कक्षा में स्थापित कर दिया गया लेकिन विक्रम लैंडर को सुरक्षित चंद्रमा की सतह पर उतारने की इसरो की कोशिश सफल नहीं हो पाई। ऑर्बिटर को पांच साल तक सेवा में रहना था लेकिन इसमें जितना ईंधन बचा है उससे यह सात साल तक सक्रिय रह सकता है। इस झटके के बाद इसरो ने नवंबर में फिर प्रक्षेपण की पटरी पर लौटा और उसने पीएसएलवी-सी47 को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया। इस रॉकेट ने कार्टोसैट-3 और अमेरिका के 13 नैनो उपग्रहों को सफलतापूर्वक पृथ्वी की कक्षा में पहुंचाया। कार्टोसैट-3 तीसरी पीढ़ी का आधुनिक भू अवलोकन उपग्रह है जिसमें उच्च रिजॉल्यूशन इमेजिंग क्षमता है। यह उपग्रह पांच साल तक सेवा में रहेगा। इसका उपयोग व्यापक पैमाने पर शहरी नियोजन, तटीय भूमि के इस्तेमाल, ग्रामीण संसाधनों और बुनियादी ढांचे के विकास में किया जाएगा। साथ ही इससे सुरक्षा बलों की अंतरिक्ष से निगरानी की क्षमता में भी बढ़ोतरी होगी।  साल का समापन पीएसएलवी के 50वें मिशन के साथ हुई। पीएसएलवी-सी48 ने देश के नए जासूसी उपग्रह रिसैट-2बीआर1 और नौ अन्य विदेशी उपग्रहों को उनकी कक्षा में पहुंचाया। शिवन ने कहा कि यह इस साल का अंतिम प्रक्षेपण होगा और इस तरह इसरो ने छह प्रक्षेपण वाहन मिशनों और सात उपग्रह मिशनों के साथ साल का समापन किया। शिवन का कहना है कि 2020 में इसरो ने पीएसएलवी, जीएसएलवी और एसएसएलवी के साथ प्रक्षेपण की कई योजनाएं बनाई हैं। हालांकि उन्होंने यह बताने से इनकार कर दिया कि आने वाले साल में इसरो कितने प्रक्षेपण करेगा। उन्होंने कहा कि पीएसएलवी अंतरिक्ष में सभी स्थानों की यात्रा कर चुका है। इनमें धु्रवीय कक्षा, भूस्थिर हस्तातंरण कक्षा, चंद्रमा और मंगल शामिल है और अब उसका अगला लक्ष्य सूर्य है। नवंबर में शिवन ने कहा था कि इसरो का व्यस्त कार्यक्रम है और मार्च 2020 तक उसके पास 13 मिशन हैं। इसके बाद 2020 के मध्य में जीसैट-20 उपग्रह का प्रक्षेपण होना है। यह अगली पीढ़ी का पांच टन वजनी उपग्रह है जो देश की संचार क्षमताओं को बढ़ाएगा और इससे देश के ग्रामीण तथा दूरदराज के इलाकों में इंटरनेट की स्पीड बढ़ाने में मदद मिलेगी।इसरो ने पहले कहा था कि वह एक नए रॉकेट एसएसएलवी का प्रक्षेपण करेगा जो 500 किग्रा भार ले जाने में सक्षम है। छोटे रॉकेटों के क्षेत्र में बढ़ रही वैश्विक प्रतिस्पद्र्घा के मद्देनजर इसका विकास किया जा रहा है। यह प्रौद्योगिकी कंपनियों और स्टार्टअप के छोटे उपग्रहों को अंतरिक्ष में लेकर जाएगा। इसरो अब चंद्रयान-3 की तैयारी कर रहा है जिसे नवंबर 2020 में छोड़ा जा सकता है और इसके जरिये एक बार फिर चंद्रमा की सतह पर लैंडर उतारने की कोशिश होगी।




 





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