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बसंत पंचमी के पर्व का आनंद लें

उत्सव प्रिय मानवा’ कथन के अनुसार भारत विविध उत्सव-पर्व एवं त्योहार आदि के माध्यम से मानवों का मनोविनोदी देश है, जहां प्रत्येक माह तथा ऋतु अपने अंचल में छिपी चंचलता से जन-मन को प्रभावित करती है। इसी परंपरा में माघ मास शुक्ल पक्ष की पंचमी को ‘वसंत पंचमी’ के नाम से जाना जाता है।
भारतीय संस्कृति में यह विधा-कला, साहित्य-संगीत, बुद्धि-विवेक प्रदायिनी एवं प्रकृति के द्वारा जगत को प्रमुदित करनेवाली अधिष्ठात्री देवी मां भारती या सरस्वती जी की जन्मतिथि मानी जाती है। ‘ब्रह्मवैवर्त पुराण’ के अनुसार यह विद्यारंभ की उत्तम तिथि है।
‘माघस्य शुक्ल पंचभ्या विद्यारंभ दिवेऽविच’
श्वेतवर्णा चतुर्भुजी मां सरस्वती की दो भुजाओं में वीणा, एक हाथ में पुस्तक तथा एक हाथ में माला सुशोभित है, जो क्रमश: संगीत कला, विद्या तथा ज्ञान की प्रतीक हैं। श्वेत वस्त्र, श्वेत पुष्प माला, श्वेत अक्षत, श्वेत दूध-दही से पूजित श्वेत हंसवाहिनी मां सरस्वती, प्रेम तथा शांति की प्रेरक हैं। ‘देवी भागवत’ में इनकी उपासना का मूल मंत्र है-
‘श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा’
विद्याकला उपासक आज के दिन अपने ग्रंथ व कला वाद्यों का भी पूजन करते हैं। साथ ही वंदन, स्तुति तथा गायन-वादन-नृत्य द्वारा मां भारती की आरती में निमग्न होकर महोत्सव मनाते हैं। यह वसंत महोत्सव प्रकृति में परिवर्तन करते हुए जड़-चेतन में प्रेम के संचार का प्रेरक है, जहां हेमंत के शीत से आहत पशु-पक्षी सहित पादपों के पल्लव पतझड़ हरे हो जाते हैं वहां वसंत के आगमन से सभी में प्रेम का संचार होने लगता है। वृक्षों में नव किसलयों का आगमन, आम की डालियों में मंजरी तथा फूलों पर भ्रमरों का भ्रमण, मोर, तोता और कोयल आदि का कुंजन व सरसों के खेतों में वसंती फूलों का आगमन ये सभी लक्षण प्रेम का संकेत देते हैं इसीलिए इस पर्व को ‘मदन महोत्सव’ भी कहते हैं। उनकी धमार गायन शैली में यह पद गाया जाता है- यद्यपि यह पर्व हिंदुस्थान में सभी जगह अपनी पद्धति के अनुसार मनाया जाता है किंतु मथुरा मंडल अर्थात ‘ब्रज भूमि में इसका विशेष महत्व है। जहां वसंती रंग में ही वसंत उत्सव का प्रारंभ होता है। सरसों के खेतों में जो फूल खिलता है उसे वसंती फूल कहते हैं। आज के दिन मां सरस्वती आदि का पूजन इन्हीं पुष्पों से होता है मंदिरों के विग्रहों की पोषाक, शृंगार और भोग सामग्री वसंती रंग में ही धराई जाती है। आज के दिन से ही यहां होली का आरंभ हो जाता है। ब्रज के गांव, नगर, मंदिर व गली-गली में एक दंड को गाड़ दिया जाता है। उसे होली का डांढ़ा कहते हैं और होली तक उसके चारों ओर सूखा र्इंधन एकत्रित किया जाता है।
ब्रज के मंदिरों में आज से ही अबीर-गुलाल उड़ने लगते हैं तथा ५० दिन तक राग वसंत में ही होली के ध्रुपद-धमार का गायन कुशल कलाकारों द्वारा किया जाता है। सूरदास आदि संत ऐसा मानते हैं कि अन्य राग बारातियों की तरह सहायक होते हैं। किंतु प्रधान राग दूल्हे की तरह वसंत होता है-
‘और राग सब भये बराती, दूलह राग वसंत।
मदन महोत्सव आज सखी री, विदा भयो हेमंत।।’
नगर-नगर में भवन-भवन में, नारी और नर में वात, वय, वृद्ध जन-जन में, वनन में वाजन में ब्रज में जहां देखो वहां वसंत उत्सव की धूम मच जाती है। ब्रज के गांवों में भी डफ, ढोल, नगाड़े पर रात-रात भर गायन-वादन, नत्य का आयोजन होता है। श्रीभर संत कहते हैं-
‘नवल वसंत वनल वृंदावन नवलीह फूले फूल
नवलहि बाजे बाजतश्री भट कालिंदी के कूल’
आज के दिन मथुरा के गांव ‘फालेन’ जिसका नाम है वहां एक ब्राह्मण परिवार द्वारिका गांव के मंदिर में तपस्या करने बैठता है और होली की रात जब होली में विशाल अग्नि प्रज्ज्वलित हो जाती है तब वह नंगे पैर जलती होली पर चढ़कर उस पार चला जाता है, जिसके पैर में छाले तक नहीं पड़ते हैं। इस अद््भुत चमत्कार का कोई वैज्ञानिक कारण आज तक निराकरण नहीं कर सका है। इस प्रकार वसंत पंचमी से प्रारंभ होकर यह वसंतोत्सव होली के बाद पंचमी को जैसे रंग पंचमी कहते हैं संपन्न होता है। अत: यह उत्सव प्रकृति प्रेमी प्रेरक मां सरस्वती की आराधना के साथ भारत का महान उत्सव हो जाता है।
भूलकर भी न करें ये काम
मां सरस्वती पूजा के दौरान कुछ ऐसी बातें है, जिनका ध्यान रखना बहुत जरूरी होता हैं। बसंत पंचमी के दिन बिना स्नान किए भोजन नहीं करना चाहिए। इस दिन रंग-बिरंगे वस्त्रों को नहीं पहनें। इस दिन पीले रंग के कपड़ें पहनना अच्छा होता है। बसंत पंचमी के दिन पेड़-पौधे नहीं काटने चाहिए। बसंत पंचमी के दिन किसी को अपशब्द नहीं बोलना चाहिए। वहीं इस दिन मांस-मदिरा का सेवन नहीं करें। इस दिन ब्रह्मचर्य का पालन करना जरूरी होता है। स्कूलों और शिक्षण संस्थानों में मां सरस्वती की पूजा के साथ साथ घरों में भी यह पूजा की जाती है अगर आप घर में मां सरस्वती की आराधना कर रहे हैं तो इन बातों का ध्यान रखना जरूरी है। सुबह नहाकर मां सरस्वती को पीले पुष्प अर्पित करें। इसके बाद पूजा के समय मां सरस्वती की वंदना जरूर करें। पूजन स्थान पर वाद्य यंत्र और किताबें रखें और बच्चों को भी पूजास्थल पर बैठाएं। बच्चों को तोहफे में पुस्तक दें।


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